भडका रहे हैं आग लब-ए-नग़्मगर से हम
ख़ामोश क्यों रहेंगे ज़माने के डर से हम
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
देगा किसी मक़ाम पे ख़ुद राहज़न का साथ
ऐसे भी बदगुमान न थे राहबर से हम
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ ख़ार कम तो कर गये गुज़रे जिधर से हम।
Monday, August 6, 2007
Tuesday, July 31, 2007
हेमंत यायावर द्वारा लिखित
कभी चलते चलते मैं रुका
जब कुछ संशय हुआ
फिर कुछ सोच कर आगे बढा
जब कुछ संशय मिटा
कांटो भरी एक राह देख कर
फूलों की राह को जा पकडा
लेकिन फूलों ने ही मुझे छला
चोट खा कर जब मेरे विश्वास का सूरज ढला
तब पर्वत बन चुके ज़रोँ ने कहा
सीधे सपाट अंधेरों से हमेशा बेहतर है
उलझे हुए उजाले चुनो
हर चीज़ मिलेगी तुम्हे यहाँ, ऐ मुसाफिर
तुम अगर चुनौती चुनो
हेमंत यायावर
जब कुछ संशय हुआ
फिर कुछ सोच कर आगे बढा
जब कुछ संशय मिटा
कांटो भरी एक राह देख कर
फूलों की राह को जा पकडा
लेकिन फूलों ने ही मुझे छला
चोट खा कर जब मेरे विश्वास का सूरज ढला
तब पर्वत बन चुके ज़रोँ ने कहा
सीधे सपाट अंधेरों से हमेशा बेहतर है
उलझे हुए उजाले चुनो
हर चीज़ मिलेगी तुम्हे यहाँ, ऐ मुसाफिर
तुम अगर चुनौती चुनो
हेमंत यायावर
Monday, July 30, 2007
" मै क्यो लिखू ? "
क्या __जरूरी है,
लिखना तुम्है समझाने को
इतने नादान भी नही तुम कि
बुझ ना सको मेरे पैमाने को ।
क्या __माँ ममत्व लिखकर दर्शाती है,
नही _ वो तो कलापों से ममत्व झलकाती है ।
क्या __भंवरा लिखता है अपने अफसाने को,
नही _ वो तो केवल गुनगुनाता है प्रॆम दर्शाने को।
क्या __पतंगा लिखता है अपना प्रॆम किसी परवाने को,
नही _ वो तो सहर्ष जल जाता है अपना प्रॆम दर्शाने को।
तो मै क्यो लिखूँ तुम्हें बतलाने को
तुम भी तो इतने नादान नही कि
बुझ ना सको मेरे पैमाने को ।
लिखना तुम्है समझाने को
इतने नादान भी नही तुम कि
बुझ ना सको मेरे पैमाने को ।
क्या __माँ ममत्व लिखकर दर्शाती है,
नही _ वो तो कलापों से ममत्व झलकाती है ।
क्या __भंवरा लिखता है अपने अफसाने को,
नही _ वो तो केवल गुनगुनाता है प्रॆम दर्शाने को।
क्या __पतंगा लिखता है अपना प्रॆम किसी परवाने को,
नही _ वो तो सहर्ष जल जाता है अपना प्रॆम दर्शाने को।
तो मै क्यो लिखूँ तुम्हें बतलाने को
तुम भी तो इतने नादान नही कि
बुझ ना सको मेरे पैमाने को ।
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